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बुधवार, 16 सितंबर 2015

कुछ हकलाने वाले बहुत तेज क्यो बोलते है ? (अपनी समस्या को नकारते क्यो है) ?

B कुछ हकलाने वाले बहुत तेज क्यो बोलते है ?   (अपनी समस्या को नकारते क्यो है) ?
बच्चे जब दो तीन वर्ष की आयु में बोलना शुरू करते है तब हकलाना या तुतलाना एक सामान्य प्रकिया मानी जाती है ,पांच छै वर्ष की आयु तक यह प्रकिर्या धीरे -धीरे कम हो जाती है। बच्चे का यह हकलाना बहुत ही सरल होता है। यानि इसमें न तो कोई संघर्ष छिपा होता है और न ही इसमे कोई प्रतिकियात्मक व्यवहार दिखाई पड़ता है। वयस्क हकलाने वालो की भावनात्मक मुशिकलें छुपाने की प्रवृतियाँ व अन्य प्रतिकियाए बच्चे में इस उम्र में दिखाई नहीं पड़ती मगर धीरे -धीरे जब ये हकलाहट के साथ बड़े होते है तो सामान्य विकास की यह प्रकिर्या आसामान्य भावनाओं प्रतिर्कियाओ और आंतरिक संघर्शो से जुड़ती चली है। भाई -बहन ,अन्य बच्चे ,माता -पिता ,शिक्षक जाने अनजाने इन बच्चो में नकारात्मक भावनाओ को जन्म देते है। बोलना ,अन्य बच्चो के साथ खेलना आदि एक अप्रिय अनुभ्व बनते चले जाते है। बच्चे के अनतभरन में शब्दों व सिथितियो का डर इतना गहरा बैठ जाता है कि बच्चे के लिये बोलना मुशिकल हों जाता है। कभी -कभी बच्चा वाक्य के बीच में ही अटक जाता है। लम्बे समय तक संघर्ष करने के बाद भी  कुछ बोल नही पाता हैं। बच्चा ऐसे ब्लॉकेज को बहुत ही शर्मनाक चटनाओं के रूप में देखता हैं। बच्चा अपनी ऐसी समझ अपने इर्द -गिर्द के लोगों की प्रतिकिया के आधार पर बनाता हैं। बहुत बार सुनने वाले ,इन बच्चो की बात को बीच में ही काट देते है। इस से बच्चे का अवचेतन जल्दी से छुट्टी पाना चाहता है लेकिन यह जल्दबाजी ही उच्चारण में और मुशिकलें पैदा कर देती है। एक बच्चे के लिये यह सबकुछ गहरे मानसिक तनाव को जन्म देता है। इस हालात में बच्चे के सामने एक ही विकल्प होता है कि अपने आप को समस्या से अलग करके देखे और समस्या को अकरे। चूकि हमारे समाज में एक तो इसको स्वास्थ्य समस्या माना ही नही जाता और वैसे भी स्पीच थैरेपी पार्यः कम शहरो में ही उपलब्ध है। इसीलिये बहुत से हकलाने वालो के लिये समस्या का नकारना ही एकमात्र विकल्प बचता है। वस्तुतः वें अगर खुलकर अपनी समस्या को स्वीकार करे इसके बारे में दोस्तों व परिवार से बात कर सके तो वो बहुत से तनाव व दुशिचन्ताओ से आसानी से मुवित पा सकते है। मै प्रायः सुनता हुँ क़ि सर हमे या हमारे बच्चे की वैसे
थोड़ी समस्या है,बस 2 -3 शब्द में अटकता है। बस जब जल्दी -जल्दी बात करता है तभी अटकता है ,बस टेन्शन में होता है तब अटकता है बस जब अचानक बोलता है तब अटकता है। ऐसे कई सवाल डेली सुनने को मिलते है। मैं बताना चाहूँगा कि हम और हमारा समाज इसे हास्य रूप में देखता हैं ,इसीलिये हम इसे नकारते हैं और बस थोड़ी सी समस्या कहते हैं जबकि वास्तविकता यह कि यह आपकी थोड़ी सी समस्या नही है बलिक आपका पूरा जीवन ही हकलाता हैं। इसे वदलना हैं आपको क्लिक हियर 

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